REET Exam 2021: Social Science Pedagogy Notes (शिक्षा शास्त्रीय मुद्दे)

Social Science Pedagogy Notes

महत्वपूर्ण बिंदु

 इस पोस्ट में हम  Social Science Pedagogy Notes नोट्स आप सभी के साथ शेयर कर रहे हैं। Social Science Pedagogy के इस नोट्स में आप शिक्षण, शिक्षण विधियां, शिक्षण सूत्र, सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु एवं  इसका उद्देश्य, सामाजिक अध्ययन की अवधारणाएं, सामाजिक अध्ययन का अन्य विषयों से संबंध, प्रायोजना,सामाजिक अध्ययन शिक्षक के सामुदायिक क्रियाकलाप,सामाजिक अध्ययन शिक्षक के गुण एवं व्यावसायिक वृद्धि, सामाजिक अध्ययन शिक्षण की समस्याएं का अध्ययन करेंगे। जो कि आगामी TET परीक्षा जैसे REET, CTET, UPTET एवं अन्य TET परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।  

शिक्षा शास्त्रीय मुद्दे

 संसार में जितने भी कार्य होते हैं, वह सभी अपने आप में एक समस्या के रूप में होते हैं.।  और किसी भी समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए, उस समस्या पर सोचना पड़ता है, तथा सोचना, समझना, विचारना  अपने आप में चिंतन कहलाता है। 

 अर्थात चिंतन का जन्म समस्या (काम) के समय होता है। 

 मनोवैज्ञानिक हम्प्रे के अनुसार चिंतन एक मानसिक क्रिया है। 

 हम लोग शिक्षक के रूप में शिक्षण कार्य करने के लिए तत्पर है।  और शिक्षण कार्य अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए यह कार्य करते समय शिक्षक को उच्च स्तरीय चिंतन करना होता है।  जिसमें वह क्या पढ़ाना है?, कैसे पढ़ाना है?, क्यों पढ़ाना है?, कितना पढ़ाना है? आदि विचार करता है। इन विचारों को आलोचनात्मक\ विश्लेषणात्मक  चिंतन कहते हैं, जो एक श्रेष्ठ शिक्षक में आवश्यक है। 

 शिक्षण कार्य सामान्य कार्य नहीं है।  इसको स्पष्ट करते हुए डॉ मुखर्जी ने लिखा है कि “शिक्षण कार्य प्रत्येक व्यक्ति के चाय के प्याले के समान नहीं है, यह तो कला और विज्ञान है।”

शिक्षण एक प्रक्रिया

 एक शिक्षक के द्वारा किया जाने वाला कार्य शिक्षण प्रक्रिया कहलाता है, क्योंकि इसमें कम से कम 2 व्यक्ति होते हैं, और दोनों के बीच में कोई अंत: क्रिया होती है। 

जैक्सन के अनुसार – ” शिक्षण कार्य एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें एक परिपक्व व्यक्ति (शिक्षक) एक अपरिपक्व व्यक्ति (शिक्षार्थी) को अंतः क्रिया द्वारा सिखाने का\ शिक्षा देने का प्रयास करता है।”

 मॉरीसन के अनुसार – ” शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिक परिपक्व व्यक्ति कम परिपक्व व्यक्ति को अंतः संबंधों द्वारा सिखाने का प्रयास करता है।”

शिक्षण दृष्टिकोण (Teaching approach)

 शिक्षण कार्य को लेकर जो विचार हमारे मन मस्तिष्क में पैदा होते हैं।  उनके आधार पर हमारा जो नजरिया बनता है, उसे शिक्षण दृष्टिकोण कहते हैं।  यह दो प्रकार का होता है। 

1.  भारतीय दृष्टिकोण –  द्विमुखी प्रक्रिया

2.  पाश्चात्य\ आधुनिक दृष्टिकोण –  त्रिमुखी प्रक्रिया

शिक्षण –  शिक्षण कार्य करते समय एक शिक्षक को क्रमशः शिक्षण विधि, शिक्षण सूत्र एवं शिक्षण सिद्धांत का उपयोग करना होता है। 




Social Science Pedagogy

शिक्षण विधि (Teaching method)

एक शिक्षक शिक्षण कार्य करते समय अपनी विषयवस्तु को बालक को तक अपने विशेष परिश्रम के द्वारा बुद्धिमानी के साथ उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए विषय वस्तु के संगठित रूप को बालक को तक प्रेषित करता है।  इसे ही शिक्षण विधि कहते हैं। शिक्षण विधि व महत्वपूर्ण कार्य है, जिस के सहयोग से शिक्षक के कार्य आगे बढ़ते हैं। 

बाइनिंग के अनुसार – “शिक्षण विधि शैक्षिक प्रक्रिया का गतिशील कार्य है।”

 जॉन डीवी के अनुसार – ” पद्धति (विधि)वह तरीका है, जिसके द्वारा हम लोग विषय वस्तु को संगठित कर निष्कर्षों की प्राप्ति करते हैं।”

 डॉ सरोज सक्सेना के अनुसार – ” शिक्षण विधि वह माध्यम है, जिसके द्वारा शिक्षक अपनी विषयवस्तु को विद्यार्थियों तक प्रेषित करता है, और वह उसके उद्देश्य पूर्ति में सहयोग करती है।”

शिक्षण विधियां तीन प्रकार की होती हैं। 

1.  परंपरागत विधियां –  पाठ्यपुस्तक विधि

2.  शिक्षक केंद्रित विधियां –  व्याख्यान (भाषण) विधि, कहानी (व्यास) विधि

3.  बाल केंद्रित विधियां –  शेष सभी विधियां

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 शिक्षण सूत्र

 शिक्षण सूत्र में मार्गदर्शक कारक होते हैं।  जिन के सहयोग से शिक्षक किसी निश्चित दिशा में शिक्षण कार्य करता है।  इन शिक्षण सूत्रों का कोई व्यक्तिगत जनक नहीं है। यह तो प्राचीन काल से लेकर अब तक विभिन्न शिक्षकों के द्वारा किए गए कार्यों के अनुसार संग्रहित अनुभव है।  जिन्हें कॉमेनियस, जॉन डीवी, ब्लूम, किलपैट्रिक जैसे विद्वानों ने एक सूत्र में बांध दिया है। 

प्रमुख शिक्षण सूत्र इस प्रकार है। 

1 . सरल से कठिन की ओर

2.  ज्ञात से अज्ञात की ओर

3.  पूर्ण से अंश की और

4.  विशिष्ट से सामान्य की ओर

5.  समीप से दूर की और

6.  प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर

7.  उदाहरण से नियम की ओर

8. मनोवैज्ञानिकता से तर्क और

9.  विश्लेषण से संश्लेषण की ओर



शिक्षण सिद्धांत (Teaching theory)

1.  रुचि का सिद्धांत

2.  प्रेरणा का सिद्धांत

3.  उद्देश्य पूर्ति का सिद्धांत

4.  क्रियाशीलता का सिद्धांत

5.  राष्ट्रीयता का सिद्धांत

6.  नियोजन का सिद्धांत

7.  लोच शीलता का सिद्धांत

8.  अभ्यास\ पुनरावृत्ति का सिद्धांत

(1) रुचि का सिद्धांत  

एक शिक्षक का शिक्षण कार्य करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की बालक को में पढ़ाई जा रही विषय वस्तु के प्रति ज्यादा से ज्यादा रुचि हो।  क्योंकि बालक में जितनी अधिक रुचि होगी उसकी अधिगम की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। एक विद्वान के अनुसार “बालक को की सक्रिय रुचि उनके अधिगम की मात्रा को बढ़ाती है।”

(2)  प्रेरणा का सिद्धांत 

शिक्षण कार्य में शिक्षक का प्रेरक के रूप में सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि प्रेरणा के द्वारा ही एक बालक उचित अधिगम की प्राप्ति में सफल होता है।  मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अभिप्रेरणा अधिगम का आधार है। स्किनर के अनुसार “अभिप्रेरणा अधिगम का सर्वोच्च राजमार्ग है।”

(3)  क्रियाशीलता का सिद्धांत 

बालक को शिक्षण कार्य के दौरान जब एक शिक्षक अपने साथ सक्रिय बनाए रखता है, तो बालक ज्यादा से ज्यादा सीखने की ओर अग्रसर होता है। 

 फ्रोबेल ने विचार दिया था कि “बालकों को करके सीखने पर जोर दिया जाना चाहिए।”  इसी विचार को जॉन डीवी ने एक सिद्धांत का रूप दिया जिससे “Learing by Doing” (करके सीखो)

(4) उद्देश्य पूर्ति का सिद्धांत

शिक्षण कार्य करते समय एक शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों को उद्देश्य का ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि बिना उद्देश्य के ज्ञान के सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाते। 

 जैसे कि रिवलिन ने लिखा है- “शिक्षण कार्य एक उद्देश्य पूर्ण नैतिक क्रिया है।”

(5)  सहसंबंधता का सिद्धांत  

शिक्षण कार्य करते समय एक शिक्षक को चाहिए कि वह एक विषय की विषय वस्तु को दूसरे विषय की विषय वस्तु से जोड़ते हुए बताने का प्रयास करें।  जिससे बालकों में आपके कार्य के प्रति सकारात्मकता पैदा होती है। 

(6)  राष्ट्रीयता का सिद्धांत 

बालक को में अपनापन और राष्ट्रीयता का भाव पैदा करते हुए, आनंददायी  शिक्षण कार्य, शिक्षक के प्रति विद्यार्थियों के मस्तिष्क में सकारात्मकता पैदा करने के साथ ही हृदय में सहानुभूति को जन्म देता है। 

(7 ) नियोजन का सिद्धांत 

 शिक्षण कार्य को समय पर पूरा करने के लिए एक शिक्षक को पाठ योजना का निर्माण कर लेना होता है।  जैसे- इकाई योजना, वार्षिक योजना, दैनिक योजना। 

(8) लोच शीलता का सिद्धांत 

शिक्षण कार्य के दौरान एक शिक्षक को अपना व्यवहार इस प्रकार बनाए रखना चाहिए कि समय के अनुसार अपने आप को ढाल सके।  क्योंकि समय के साथ अनुकूलन भी अधिगम की परिभाषा में आता है। 

(9) अभ्यास\ पुनरावृत्ति का सिद्धांत 

शिक्षण कार्य के दौरान एक शिक्षक को चाहिए कि वह अपने बालकों को विषय वस्तु के बारे में समझाते समय अभ्यास पर गौर करें और अपने विचारों की  पुनरावृति करें। ऐसा करने से बालकों में एक समान प्रकार से अधिगम की प्राप्ति संभव है। 

Social Science Pedagogy Notes



सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु एवं इसका उद्देश्य 

सामाजिक अध्ययन की उत्पत्ति

  वैदिक काल मे  केवल ईश्वर और प्रकृति के बारे में अध्ययन किया जाता था।  इसलिए सबसे पहले प्रकृति विज्ञानों का जन्म हुआ। 

  • यूनानी दार्शनिक सुकरात ने ई.पू. 5वी सदी मे पहली बार कहा था कि  मनुष्य को मनुष्य का अध्ययन करना चाहिए। 
  • ई.पू. 5वी – 4वी सदी मे सुकरात कि शिष्य प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में लिखा था, कि मनुष्य  प्रकृति और ईश्वर एक दूसरे से इस प्रकार बंधे हुए हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। इन्होंने ही सबसे पहले आत्मा की अवधारणा दी।  
  •  प्लेटो उनके शिष्य अरस्तु ने ई.पू.चौथी सदी मे  आत्मा का अध्ययन शुरू किया। इन्हीं के इस अध्ययन के बाद विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का जन्म हुआ।  अरस्तू ने ही पहली बार कहा था। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और समाज में रहना पसंद करता है। 
  • अरस्तु के काल से लेकर 19 वी सदी के बीच तक कई प्रकार के सामाजिक विज्ञानों का जन्म हुआ।  परंतु इन्हें केवल वयस्क लोगों को पढ़ाया जाता था। पहली बार 19 वी सदी में ब्रिटेन से एक विचारधारा आई।  जिसमें भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र एवं अर्थशास्त्र को सम्मिलित करते हुए सामाजिक अध्ययन नाम दिया गया और विभिन्न देशों में इसके अध्ययन को लेकर परामर्श किया गया। 
  •  पहली बार 1892 ईस्वी में अमेरिका ने इनकी विषय वस्तु को विद्यालयों में पढ़ाना शुरू किया। 
  •  1911 ईस्वी में ब्रिटेन की कमेटी की सिफारिश के आधार मे  सामाजिक अध्ययन में समाजशास्त्र की विषय वस्तु भी सम्मिलित की गई। 
  • इतिहास व समाजशास्त्र के साथ दर्शन से संबंधित विषय वस्तु का भी सामाजिक अध्ययन में भी आगमन हुआ।  इस प्रकार से वर्तमान समय में सामाजिक अध्ययन में 6 मूल विषय है। 
  • भारत देश में सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु 1916 में अंग्रेजों के जमाने में लाई गई।  जिस के विकास का प्रयास 1921 में किया गया, और सबसे सफल प्रयास 1934 में ‘Social Studies commission’ के माध्यम से हुआ। 
  • स्वतंत्रता के बाद 1952-53 में  मुदालियर आयोग\ लक्ष्मण स्वामी आयोग\ माध्यमिक शिक्षा आयोग ने अपनी सिफारिशें दी जिसके आधार पर 1955 ईस्वी में भारत के विद्यालयों में इस को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाने लगा। 

 सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु एवं उद्देश्य

(1) भूगोल (Geography)

उच्च प्राथमिक स्तर तक की विषय वस्तु में मानव भौतिक भूगोल की विषय वस्तु सम्मिलित की जाती है।  जिसमें पाषाण युगीन आदिमानव की उस जीवन का वर्णन किया जाता है। जिसमें वह केवल भोजन की तलाश में भटकता रहता था, और उसका निवास गुफाएं, कंदराओ  या नदी, नालों के किनारे होता था। उसके जीवन की विशेषताओं को आधुनिक समय से तुलना करते हुए पढ़ाया जाता है। तथा भौतिक भूगोल की विषय वस्तु में महाद्वीप, महासागर, पहाड़, नदियां, झरने एवं  मरुस्थल जैसी संरचनाओं के साथ ही प्राकृतिक घटनाएं जिनमें रात दिन का बनना, ऋतुओ का बनना, जलवायु चंद्रमा सूर्य ग्रहण, ज्वार भाटा आदि की जानकारियां सम्मिलित करते हैं। 

 भूगोल की विषय वस्तु का उद्देश्य

1.  बालक को भौतिक पर्यावरण की समझ प्रदान करना।

2 . बालक को पर्यावरण सुरक्षा के लिए तैयार करना।

3.  प्राकृतिक घटनाओं के महत्व को समझाना।

4.  राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का ज्ञान करवाना।

(2) इतिहास (History)

 इतिहास के विषय वस्तु में सभ्यताओं के काल से लेकर आधुनिक काल के बीच के विभिन्न कालों जैसे कि वैदिक काल, मौर्य काल, गुप्त काल, राजपूत काल, मुगल काल एवं आधुनिक काल से जुड़ी हुई उन सभी प्रमुख घटनाओं को सम्मिलित किया जाता है।  जो आदर्श घटनाएं थी। साथ ही महान शासकों का जीवन व महापुरुषों का योगदान जैसी विषय वस्तु का समावेश है। हमारी परंपराएं और संस्कृति से संबंधित जानकारियां भी इस की विषय वस्तु में समाहित है। 

 इतिहास की विषय वस्तु का उद्देश्य

1.  विकास किया और कैसे हुआ की अवधारणा को समझाना।

2.  इतिहास अपने आप में दोहराता है, और परिवर्तन प्रकृति का नियम है।  इस विचार को स्पष्ट करना। 

3.  हमारी परंपराएं एवं संस्कृति धरोहर से संबंधित संरक्षण विचारों को पैदा करना।

4.  इतिहास काल की घटनाओं से सीख लेते हुए दोबारा ऐसी गलती ना हो पाए के विचार पैदा करना। 

(3)  नागरिक शास्त्र (Civics)

उच्च प्राथमिक स्तर तक की विषय वस्तु में नागरिक शास्त्र के नाम से राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन से संबंधित सामान्य विषय वस्तु सम्मिलित की जाती है।  जिसमें संविधान की सामान्य जानकारियां, संविधान के अनुसार हमारे अधिकार और कर्तव्य, राष्ट्रीय प्रतीक एवं राष्ट्रीय चिन्हों की जानकारियां। इसके अलावा राज्य व जिला प्रशासन से संबंधित जानकारियां समाहित होती है। 

 नागरिक शास्त्र की विषय वस्तु के उद्देश्य

1.  नागरिक शास्त्र की विषय वस्तु बालक को सुनागरिक के रूप में स्थापित करती है।

2.  एक व्यक्ति को देशकाल परिस्थितियों के अनुसार उसके अधिकार और कर्तव्यों का ज्ञान करवाती है। 

3.  एक बालक को राष्ट्रीय सिखाने के साथ ही राष्ट्र  व राज्यों के संबंधों की जानकारी देती है। 

4. व्यक्ति को अनुशासित व नियंत्रित बनाती है। 

(4)  अर्थशास्त्र (Economics)   

अर्थशास्त्र उच्च प्राथमिक स्तर तक अर्थशास्त्र की विषय वस्तु में विभिन्न प्रकार की आय के संसाधन एवं उसके स्त्रोत जैसे- कृषि, पशु पालन, बागवानी, व्यवसाय, सेवा कार्य, उद्योग एवं सामाजिक क्षेत्र के विभिन्न संसाधन तथा धन के नियोजन से संबंधित जानकारियां जैसे- बीमा, बैंकिंग, बचत आदि की विषय वस्तु सम्मिलित होती है।  सामान्य जानकारियों के साथ ही बालक को प्रारंभ से ही राष्ट्रीय और व्यक्तिगत आय की जानकारियां देने वाली विषय वस्तु जोड़ी जाती है। 

 अर्थशास्त्र की विषय वस्तु की उद्देश्य 

1.  बालक को आए के संसाधनों का ज्ञान प्रदान  करना। 

2. बालक को सामाजिक, आर्थिक संपन्नता प्रदान करना। 

3. धन के नियोजन को समझाना। 

4.  बालक को राष्ट्रीय आय की समझ प्रदान करना। 

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(5)  समाजशास्त्र (Sociology)

  समाजशास्त्र की विषय वस्तु में परिवार व समाज से संबंधित सामान्य जानकारियों को सम्मिलित किया जाता है।  तथा सामाजिक संबंधों की संरचना के आधार पर प्रस्थिति (समाज में कोई पद) तथा भूमिका ( पद के अनुसार कार्य) से संबंधित जानकारियां संबंधित की जाती है।  समाज की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए पारिवारिक व सामाजिक संबंधों का उल्लेख किया जाता है। 

 समाजशास्त्र की विषय वस्तु के उद्देश्य

1  बालक को सामाजिक प्राणी के रूप में स्थापित करना। 

2 सामाजिक संरचना का ज्ञान प्रदान करना।

3  सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने के लिए बालक को प्रारंभ से तैयार करना।

4  समाज मे  हमारे कर्तव्यों का क्या महत्व है, इसे स्पष्ट करना।

(6) दर्शनशास्त्र (Philosophy)

 उच्च प्राथमिक स्तर तक सामान्य दर्शन की जानकारियां होती हैं, जिसमें जैन दर्शन, बौद्ध  दर्शन, गांधी दर्शन,सांख्य दर्शन से संबंधित विचार होते हैं। 

दर्शनशास्त्र की विषय वस्तु के उद्देश्य-  बाला को को धार्मिक कट्टरवादीता से ऊपर उठाकर तर्कशील चिंतनशील बनाना दर्शनशास्त्र की विषय वस्तु का उद्देश्य है। 

सामाजिक अध्ययन की अवधारणा (Social studies concept)

 किसी भी विषय की विषय वस्तु को लेकर जब कोई विद्वान या व्यक्ति अपना नजरिया दृष्टिकोण या विचार अभिव्यक्त करता है, तो मनोविज्ञान की भाषा में इसे अवधारणा कहते हैं। 

 सामाजिक अध्ययन के संदर्भ में प्रचलित अवधारणाएं इस प्रकार हैं। 

1.  एम.पी. मुफात के अनुसार – “जीवन जीना एक सुंदर कला है, जो सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु से ही आती है।”

2. जोरोलिमैक के अनुसार – “सामाजिक अध्ययन सामाजिक संबंधों का अध्ययन है।”

3.  शब्दकोष के अनुसार – ” सामाजिक अध्ययन भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि  इसकी विषय वस्तु में से संग्रहित वह जानकारी है, जो व्यक्ति को एक जीवन की दिशा देती है।”

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सामाजिक अध्ययन\ विज्ञान का अन्य विषयों से संबंध (Social Studies \ Science related to other subjects)

(1)  सामाजिक अध्ययन एवं भाषा (Social Studies and Language)

 किसी भी विषय को सीखने सिखाने में भाषा का योगदान होता है।  ठीक उसी प्रकार से सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु जिन सामाजिक संबंधों की चर्चा करती है।  उस चर्चा या व्यवहार में भाषा के माध्यम से ही विचारों का आदान-प्रदान होता है। यदि सामाजिक व्यवस्थाओं से भाषा के ज्ञान को अलग कर दिया जाए तो सामाजिक अध्ययन संभव नहीं हो।  इसलिए इन दोनों विषय में प्रगाढ़ संबंध है। 

(2)  सामाजिक अध्ययन एवं कला (Social studies and arts)

आज के इस दौर में विज्ञान के आविष्कारों ने हमें उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हमारे चारों और हर क्षेत्र में विज्ञान ही विज्ञान है।  चिकित्सा, यातायात, मनोरंजन, खानपान, वेशभूषा, आवाज यहां तक कि बातचीत करने में भी विज्ञान समाहित है। यानी विज्ञान को सामाजिक अध्ययन से पृथक नहीं किया जा सकता है। 

इससे संबंधित प्रश्न उत्तर

 प्रश्न1  किसने कहा था कि मनुष्य को मनुष्य का अध्ययन करना चाहिए?

 उत्तर-  सुकरात ने

 प्रश्न2  किस आयोग की सिफारिश से 1955 में भारत देश में सामाजिक अध्ययन का शिक्षण कार्य शुरू हुआ?

 उत्तर-  मुदालियर आयोग ( 1952-53)

 प्रश्न3  किस विद्वान ने सबसे पहले कौन सी पुस्तक में आत्मा शब्द का उल्लेख किया?

 उत्तर-  प्लेटो ने रिपब्लिक में

 प्रश्न4  सर्वप्रथम किसने कहा था ” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।”

 उत्तर-  अरस्तू ने

 प्रश्न5   ‘Social Studies commession’ का गठन कब हुआ?

 उत्तर-  1934 में

प्रश्न6  कौन सी विषय वस्तु बालक को सामाजिक आर्थिक संपन्नता प्रदान करती है?

 उत्तर-  अर्थशास्त्र

 प्रश्न7 किस कमेटी के प्रयासों से सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु में समाजशास्त्र भी जोड़ा गया?

 उत्तर-  कमेटी ऑफ टेन (1911 में) 

 प्रश्न8  अमेरिका में सबसे पहले सामाजिक अध्ययन को कपड़ा या जाने लगा?

 उत्तर-  1892 में 

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(Social Studies Teacher’s Community Activities) सामाजिक अध्ययन शिक्षक के सामुदायिक क्रियाकलाप

 सामाजिक अध्ययन शिक्षक के सामुदायिक क्रियाकलाप इस प्रकार हैं। 

  • नारा लेखन
  •  प्रभात फेरी का आयोजन
  •  वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन
  •  स्वास्थ्य शिविर
  •  बालिका शिक्षा विकास सेवर
  •  बालसभा का आयोजन
  •  रक्तदान शिविर
  •  बाल मेले का आयोजन
  •  बचत\ बीमा\ बैंकिंग कार्यशाला
  •  स्वच्छता अभियान
  • रैली

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सामाजिक अध्ययन शिक्षक के गुण एवं व्यवसायिक वृद्धि (Qualities and professional growth of social studies teacher)

 सामाजिक जीवन के एक शिक्षक की क्या भूमिका है इसके बारे में समझने के लिए निम्न विद्वानों के विचार पर्याप्त हैं। 

 रायबर्न के अनुसार – ” शिक्षक समाज का सबसे चरित्रवान व्यक्ति होता है।”

 राधाकृष्णन के अनुसार – “वह राष्ट्र उतना ही महान है, जितना महान उस राष्ट्र का शिक्षक है।”

 भारतीय दर्शन के अनुसार

1. ‘समाज का दर्पण है।’

2. ‘ शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।’

3. ‘ शिक्षक बालक का भाग्य विधाता है।’

एक शिक्षक के रूप में जब एक व्यक्ति कार्य करता है, तो उसमें विभिन्न प्रकार के गुणों की आवश्यकता होती है।  जैसे कि कुबर्ली के अनुसार – “शिक्षक के रूप में वह व्यक्ति सफल है, जो ज्ञानी, तर्क पान एवं अदम्य साहसी है।”

शिक्षक के अन्य गुण (Other qualities of teacher)

1.  व्यक्तिगत गुण (Personal qualities)

  • अनुशासन प्रिय
  •  आकर्षक व्यक्तित्व
  •  सत्यवादीता, कर्तव्य निष्ठता
  •  समय के पाबंद
  •  सहजता
  •  मृदुभाषी
  •  सहनशीलता

2.  सामाजिक गुण (social skill)

  • लोकप्रिय
  •  मिलनसार
  •  सहयोगी भावना
  •  सहकारिता का भाव
  •  सहृदय
  •  सामाजिक सरोकार प्रिय

3. व्यावसायिक गुण (Business quality)

  •  मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण
  •  शिक्षण विधियों का जानकार
  •  बाल व्यवहार का जानकार 

व्यावसायिक वृद्धि (Business growth)

  • उपलब्ध सभी प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं का नियमित पाठ्य होना चाहिए। 
  •  सामाजिक विज्ञान से संबंधित पत्रिकाओं का नियमित पाठक व सहयोगी होना चाहिए। 
  •  शिक्षक सम्मेलनों में भाग लेना चाहिए। 
  •  सामाजिक समारोह, उत्साह  एवं पर्वों में भाग लेना चाहे।
  •  धार्मिक त्योहारों एवं विभिन्न प्रकार के पर्वों में सकारात्मक भावों से अग्रणी रहना चाहिए।
  •  सरकारी व गैर सरकारी सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए।
  •  विद्यालय में प्रार्थना स्थल पर बालकों को नियमित रूप से दैनिक समाचार पढ़कर सुनाने चाहिए।
  •  विभिन्न प्रकार के धार्मिक, सांस्कृतिक मेलों में भाग लेना चाहिए।

सामाजिक अध्ययन शिक्षण की समस्याएं (Problems of teaching social studies)

1  यह विषय सीधे-सीधे किसी व्यवसाय के बारे में मार्गदर्शन नहीं करता है। 

स्वयं बालक इस विषय के प्रति गंभीर नहीं होता है। 

अभिभावक भी इस विषय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते हैं।

4. सरकार भी इस विषय के प्रति उदासीन है।

5.  यह सामाजिक प्रायोगिक विषय है, परंतु इसके लिए प्रयोगशाला का अभाव है।

6. स्वयं सामाजिक विज्ञान का शिक्षक अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर नहीं रहता है।




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