Language & Thought Notes (भाषा और चिंतन) For CTET, UPTET,HTET

भाषा और चिंतन (Language & Thought Notes)

महत्वपूर्ण बिंदु

  दोस्तों आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ शिक्षक भर्ती परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण टॉपिक (Language & Thought Notes) “भाषा और चिंतन” के नोट्स आप सभी के साथ शेयर कर रहे हैं।  भाषा और चिंतन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बिंदु आपको इस पोस्ट में प्राप्त होंगे।  जो कि आगामी सभी शिक्षक भर्ती परीक्षा जैसे कि UPTET, CTET,  MPTET, HTET, RTET,TET  अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक है।  इससे संबंधित एक से दो प्रश्न परीक्षा में पूछे जाते हैं।  यदि आप शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो यह (Language & Thought Notes ) टॉपिक आपके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है, आशा है यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी साबित होगी। 

भाषा (Language)

 भाषा भावों को व्यक्त करने का एक माध्यम है।  मनुष्य पशुओं से इसलिए श्रेष्ठ है, क्योंकि उसके पास  अभिव्यक्ति के लिए एक ऐसी भाषा होती है।जिससे लोग समझ सके। 

बालकों में भाषा का विकास (Language development in children)

बालकों के विकास में विभिन्न आयाम होते हैं।  भाषा उन्हीं में से एक है। भाषा को अर्जित किया जा सकता है, यह अर्जन बालक  के जन्म से ही शुरू हो जाता है। 

 अनुकरण,  वातावरण के साथ अनुक्रिया , शारीरिक,  सामाजिक व मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की मांग इसमें विशेष भूमिका निभाती है। 

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भाषा के भाग

(1)  स्वनिम

(2) रूपिम

(3) वाक्य विन्यास

(4)  अर्थ विन्यास

# भाषा विकास की प्रारंभिक अवस्था

Step 1. बालक जन्म होते ही रोने चिल्लाने की कोशिश करता है। 

Step 2.  रोने चिल्लाने की कोई इसके साथ ही वह अन्य ध्वनि निकालने लगता  है, यह पूर्ण तहा स्वाभाविक होती है। इन्हें सीखा नहीं जाता। 

Step 3.   हड़बड़ाने की क्रिया,  हड़बड़ाने के माध्यम से स्वर व व्यंजन के अभ्यास का अवसर पाते है। 

Step 4. दूसरों को सुनकर उन्हें दोहराने की कोशिश करते हैं। इनके द्वारा अ,ई,उ,ए  इत्यादि को उपचारित किया जाता है। 

 Step 5.  हाव भाव व इशारों की भाषा बालकों को धीरे-धीरे समझ में आने लगती है। 

 # भाषा विकास के चरण (Steps of language development)

Steps of language development

 बालक को के भाषा विकास के दो चरण होते हैं जो कि इस प्रकार है। 

1. प्राक्र भाषा विकास (Pre- speech development)

  • रुदन (Crying) – यह भाषा का सबसे पहला स्पष्टीकरण होता है। रिबल ने इसे “आपात श्वासन” (Emergency Respiration) कहां है। 
  •  बलबलाना (Babbling) –  इस चरण में बालक 2 माह तक स्वर ध्वनियां उत्पन्न करना सीखता है। 

 3 से 4 माह में स्वर तथा व्यंजन साथ में प्रयोग करता है तथा 12 माह तक अर्थपूर्ण बलबलाना  जैसे – “मा मा,दा दा” आदि। 

  •  हावभाव (Gestures) – इस चरण में शिशु शरीर के अंगों के प्रयोग द्वारा अपनी बात समझाना  सीखता है। 

जैसे –  खुशी होने पर बाहें  फैलाना, खुश होना 

    •   संवेगिक अभिव्यक्ति ( emotional  expression) –   भाषा का यह चरण 12 से 13 माह तक रहता है।  



2. उत्तर कालीन भाषा विकास (later speech development)

  •  दूसरों की भाषा समझना (Comparison of speech of others) – भाषा विकास की सबसे पहली अवस्था है। 
  •  शब्दावली का निर्माण (Buiding a Vocabulary) –  सबसे पहले बालक भूख प्रेरणा से संबंधित शब्द सीखते हैं। 

  18 माह  – 10 शब्द

  24 माह –  29 शब्द

  इसके बाद –  200  से 300 शब्द

  •  शब्दों का वाक्य में संगठन ( Combining Words Into Sentance) –  शब्दों का वाक्य संगठन में बालक इस प्रकार से सीखता है। 

 2 वर्ष –  पहला प्रयास

 ढाई वर्ष –  संज्ञा + क्रिया

 5 वर्ष –  सभी शब्द भेदों का प्रयोग

  • उच्चारण (Pronunciations) – इस चरण में  शिशु अनुकरण से उच्चारण सीखता है। 
  •  भाषा विकास का स्वामित्व (Mastery of language development) –  इस चरण में बालक को लिखे तथा मौखिक भाषा पर अच्छा नियंत्रण हो जाता है। 

 # बालक की आयु के अनुसार शब्द भंडार

(Language & Thought Notes)

बालक की आयु
शब्द भंडार
जन्म से 8 माह तक
9 से 12 माह 3 से 4 शब्द
डेढ़ वर्ष तक 10 से 12 शब्द
2 वर्ष तक 272 शब्द
ढाई वर्ष तक 450 शब्द
3 वर्ष तक 1  हजार शब्द

साढे 3 वर्ष तक

1250 शब्द
4 वर्ष तक  1600 शब्द
5 वर्ष तक 2100  शब्द
  11 वर्ष तक 50,000  शब्द
14 वर्ष तक 80,000  शब्द
  16 वर्ष से आगे 1  लाख से अधिक शब्द 

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक 

बच्चे का संपूर्ण विकास के लिए भाषा विकास परम आवश्यक है।  भाषा के बिना ना तो बालक कुछ समझता है ना ही अपनी संवेग दिखाता है।  भाषा के विकास को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं जिनमें से प्रमुख  कारक इस प्रकार है। 

1.  पारिवारिक स्थितियां

बालक जिस परिवार में जन्म लेता है। उस परिवार की भाषा का विशेष प्रभाव बालक पर पड़ता है।  बालक के भाषा के विकास में माता-पिता की भूमिका सर्वोपरि होती है। बालक अपनी माता की गोद में जिस भाषा को सीखता है उसी का नाम मां की भाषा है।  माता अपने बालक से जो बातचीत करती है उसे ही Baby Talk कहते हैं। 

पारिवारिक स्थितियों का अर्थ परिवार का आकार, बच्चों का जन्म क्रम, परिवार की आर्थिक, सामाजिक स्थिति, परिवार की शैक्षणिक स्थिति आदि। 

  “पियाजे” ने अपनी शोध में कहा था कि बड़े आकार  के परिवार की अपेक्षा छोटे आकार वाले परिवार के बालक का भाषा विकास अधिक सफल रहता है।  कहने का अर्थ है कि जिस परिवार में बालको की संख्या अधिक होगी, उस परिवार में बालको ओर बड़ों के बीच बातचीत कम ही होती है। 

” ब्रॉडी” ने लिखा है  कि परिवार के पहले बच्चे का भाषा विकास, दूसरे, तीसरे एवं चौथे से अधिक होता है।  क्योंकि मात पिता का प्रथम बच्चे पर अधिक निगरानी रखते हैं।  

“हरलॉक”  ने कहा है कि जिस परिवार की सामाजिक और आर्थिक या उच्च होती है।  उस परिवार के बालक का भाषा विकास अधिक होता है। क्योंकि ऐसे परिवार अपने बालकों के साथ बातचीत करना अच्छा समझते हैं।  अपने बालक उनके मानसिक विकास हेतु अलग से संस्थानों का प्रयोग करते हैं। पौष्टिक आहार तथा अच्छे विद्यालय का चुनाव करते हैं। 

शिक्षित परिवार जो अर्थ के दृष्टिकोण से पिछड़ा भी हो तो अपने बालकों की शिक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं।  बालक उनके साथ बातचीत में उन्नत भाषा का प्रयोग करते हैं। बातचीत में लोक कथाएं, लोकगीत का प्रयोग करते हैं।  जिसके कारण बालकों का उन्नत विकास होता। 

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2. पड़ोस

 बालक 4 से 5 वर्ष का होते होते पड़ोस में जाना प्रारंभ कर देता है।  यहां पर बालको का सामाजिक अनुक्रिया तीव्र होती है। कोई भी बालक पड़ोस के बालकों का अनुसरण करता है।  यह अनुसरण उसकी भाषा पर पूर्व प्रभाव डालता है। 

” हरलॉक” के अनुसार, भाषा के विकास में अनुकरण का विशेष प्रभाव होता है। तुतलाना, हकलाना आदि प्रकार के भाषा त्रुटि  पड़ोस से ही सीखता है। 

3 खेल और खेल के साथी

 बच्चे का समय खाने और पहनने के सिवा खेल में या खेल के मैदान में भी  बीतता है। जिस प्रकार के खेल का मैदान होगा, खेल संबंधी भाषा का प्रयोग उसी प्रकार होगा। 

“गुल्लीक”  महोदय ने लिखा है कि बच्चे को अच्छे खेल तथा अच्छे साथियों के बीच रहने की प्रेरणा  दे।

4. भाषा की संख्या

बालकों  को भाषा में उन्नत बनाने हेतु एक साथ कई भाषाओं का प्रयोग नहीं करवाना चाहिए।  बालक के समुन्नत विकास मातृभाषा सबसे उन्नत है। मातृभाषा के पूर्ण ने पूर्ण होने पर ही किसी दूसरी भाषा को प्रेरित करना चाहिए। 

” मैंकार्थी”  ने लिखा है कि जिन बालकों को सबसे पहले मात्र भाषा सिखाई जाती है, उस  बालक का भाषा विकास समुचित होता है। 

5  विद्यालय और शिक्षक

 बालको के शिक्षक आदर्श होते हैं।  बालकों की भाषा विकास पर शिक्षक की भाषा का पूर्ण प्रभाव पड़ता है।  यदि विद्यालय के शिक्षक भाषा के प्रयोग में निपुण हो, भाषा का उच्चारण सही हो तो उस विद्यालय के बालक का भाषा विकास बेहतर होगा। 

 विद्यालय के साथी की भाषा भी बालक ओके भाषा विकास को प्रभावित करती है।  जबकि विद्यालय के साथी अच्छी भाषा का प्रयोग करते हैं तो बालकों का भाषा विकास सामान्य रूप से विकसित होता रहेगा। 

 अतः कहा जा सकता है कि बालकों के भाषा के विकास में परिवार के सदस्य, खेल मैदान के साथी, शिक्षक तथा वर्ग के साथियों का पूर्ण प्रभाव होता है। 

भाषा के सीखने के विभिन्न साधन

(1)  कहानी सुनना

(2)  प्रश्न उत्तर के द्वारा

(3)  अनुकरण

(4) बातचीत 

भाषा विकास के सिद्धांत

1.  परिपक्वता का सिद्धांत

 परिपक्वता का तात्पर्य है कि भाषा अवयवों एवं स्वरूप पर नियंत्रण होना। 

2.  अनुबंध\ साहचर्य का सिद्धांत 

 बच्चे विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति से सहचार्य स्थापित करते हैं।  और अभ्यास हो जाने पर समृद्ध वस्तु या व्यक्ति की उपस्थिति पर संबंधित शब्द से संबोधित करते हैं। 

3. अनुकरण का सिद्धांत 

अन्य विद्वानों के अनुसार भाषा  विकास के सिद्धांत 

भाषा विकास का सिद्धांत – पावलव के अनुसार –  बालक भाषा शब्द  अर्थ के मध्य संबंध स्थापित करके सीखता है। 

 इस संबंध को पावलव  ने अनुबंध नाम दिया है अतः पावलव के अनुसार बालक भाषा अनुबंध के माध्यम से सीखता है। 

भाषा विकास का सिद्धांत – स्किनर के अनुसार –  बालक भाषा अनुकरण बा पुनर्बलन के माध्यम से सीखता है। 

भाषा विकास का सिद्धांत – बाडुरा के अनुसार बालक भाषा अनुकरण से सीखता है। बाडुरा ने भाषा विकास में पुनर्बलन को महत्व नहीं दिया है। 

नाॅम चाॅमस्की के अनुसार (भाषा विकास का सिद्धांत)

  • नाॅम चाॅमस्की  के अनुसार बालक जिस भाषा को सुनता है उसे अपने आप सीख जाता है। 
  •  बालक में भाषा ग्रहण करने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है।  जिसे ” भाषा अर्जन तंत्र”(LAD) (Language Acquisition Divice) के नाम से जाना जाता है। 
  • नाॅम चाॅमस्की  का मानना है कि बालक जिस भाषा को सुनता है, उसकी व्याकरण को भी अपने आप सीख जाता है।  इसीलिए इस सिद्धांत को ” जेनेरेटिव ग्रामर थ्योरी”  कहा जाता है।
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चिंतन व चिंतन के प्रकार तथा साधन (Thinking/ types n tools)

thinking types development and tools psychology

चिंतन 

मानव में व्याप्त ऐसी मनोवैज्ञानिक क्रिया, जिसमें वह समस्या विशेष के समाधान के लिए सोचता है या विचार करता है चिंतन कहलाता है। 

 चिंतन प्रक्रिया प्रतीकों वचनों के आधार पर चलती है।  चिंतन तथा कल्पना दोनों ही ज्ञानात्मक व रचनात्मक मानसिक प्रक्रिया है। 

 परिभाषाएं 

 गैरेट के अनुसार – “चिंतन एक प्रकार का अदृश्य व्यवहार है, जिसमें सामान्य रूप से प्रतिकूल का प्रयोग होता है।” 

 रॉस के अनुसार – “चिंतन मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पक्ष है। “

 वैलेंटाइन के अनुसार – “मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिंतन शब्द का प्रयोग उस क्रिया के लिए होना\ किया जाना चाहिएजिसमें श्रृंखलाबद्ध विचार किसी लक्ष्य की और अब राम गति से प्रवाहित होते हैं।” 

कागन तथा हेमैन के अनुसार – ” प्रतिमाओं, प्रतिको, सम्प्रत्यो, नियमों एवं अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक जोड़-तोड़ को चिंतन कहा जाता है।”

  • चिंतन प्रक्रिया की शुरुआत समस्या सामने होने से होती है। 
  •  चिंतन में सभी भिन्न-भिन्न पहेलियों के समाधान को एक एक साथ संयोजित किया जाता है। 
  • प्रत्येक चिंतन का उद्देश्य समस्या को सुलझाना होता है। 
  • चिंतन में गत अनुभूति शामिल होती है। 
  • समस्या समाधान की विधि ” प्रत्यन व  भूल” विधि का एक उदाहरण है। 
  •   सभी चिंतन लक्ष्य निर्देशित होते हैं। 
  •  चिंतन में भाषा, प्रतीक तथा प्रतिमाओं का काफी योगदान है।

 चिंतन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है, जिसके सहारे प्राणी किसी समस्या का समाधान करता है। 

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 चिंतन के प्रकार

 जिम्बार्डो तथा रूप केद्वारा चिंतन के दो प्रकार बताए गए हैं। 

1. स्वली चिंतन (Autistic thinking)

  स्वली चिंतन  काल्पनिक विचारों एवं इच्छाओं की अभिव्यक्ति पर आधारित होता है।  स्वली चिंतन ऐसे चिंतन को कहा जाता है। जिसमें व्यक्ति अपनी कल्पनाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है।  जैसे यदि कोई छात्र यह कल्पना करता है कि पढ़ाई खत्म हो जाने के बाद वह बड़ा अक्सर बनेगा। उसके पास एक सुंदर बंगला होगा।  चमचमाती कार होगी। तो यह स्वली चिंतन का उदाहरण है इसके अंदर किसी समस्या का समाधान नहीं होता। 

उदाहरण –  स्वप्न देख कर उसे सब को बताना

2.  यथार्थवादी चिंतन (Realistic thinking) 

यह  वैसा चिंतन है, जिसका संबंध वास्तविकता  से होता है। जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान किया जा सकता है।  जैसे कोई व्यक्ति कार के अंदर बैठकर सफर कर रहा है। अचानक उसकी कार रुक जाती है तो उसके दिमाग के अंदर पहला प्रश्न आता है, कार कैसे रुकी।  फिर वह इस समस्या के समाधान के लिए चिंतन करता है। 

  यथार्थवादी चिंतन को मनोवैज्ञानिकों ने तीन भागों में विभाजित किया है जो कि इस प्रकार है। 

  •  अभिसारी चिंतन (Convergent thinking)

अभिसारी चिंतन को निगमनात्मक चिंतन भी कहा जाता है। चिंतन के अंदर व्यक्ति किसी दिए गए तथ्यों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है।  यदि आप से पूछा जाए कि 2 व 3 को जोड़ने पर कितना आएगा तो इस समस्या के समाधान में अभिसारी चिंतन का प्रयोग होगा। 

  •  सृजनात्मक चिंतन ( Creative Thinking) 

 इस चिंतन को  आगमनात्माक चिंतन कहा जाता है। इस चिंतन के अंदर व्यक्ति को कुछ तथ्य तो दिए होते हैं।  उनमें अपनी ओर से एक तथ्य जोड़कर निष्कर्ष निकाला जाता है। जैसे कि किसी व्यक्ति को कलम का असाधारण प्रयोग करने को कहा जाए।  तब व्यक्ति को इसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ना होता है। 

  •  आलोचनात्मक चिंतन ( evaluative thinking) 

आलोचनात्मक चिंतन में गुण दोष को देखते हुए किसी बात को स्वीकार किया जाता है। अर्थात किसी वस्तु या तथ्य की सच्चाई को स्वीकार करने से पहले उसके गुण दोष को पूरी तरह से परख लेना ही आलोचनात्मक चिंतन का उदाहरण है।  हमारे समाज के अंदर कुछ व्यक्ति तो ऐसे हैं जो किसी भी प्रकार को बिना सोचे समझे ही स्वीकार कर लेते हैं। तब यह कहा जा सकता है कि उनमें आलोचनात्मक चिंतन पावर कमजोर है। 

 चिंतन के साधन (Tools for factors of thinking)

(1)  प्रतिमा ( image)

(2)  भाषा ( language)

(3) संप्रत्यय ( concept)

 (4) प्रतिज्ञाप्ति ( Proposition)

Language and Thought Important Questions For CTET, MPTET & TET Exam





 इस पोस्ट में आपने जाना भाषा और चिंतन (Language & Thought Notes ) से  संबंधित सभी महत्वपूर्ण बिंदु जोकि परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अन्य महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए आप हमारे फेसबुक पेज को भी लाइक कर सकते हैं धन्यवाद!!!

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